जनता लाइन में, नेता एयरकंडीशन बंगले में

Belal Jani
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टैक्स जनता दे रही, मौज मान रहे जनप्रतिनिधि

सांसद-विधायकों की सुविधाओं पर उठे बड़े सवाल

वेतन, मुफ्त यात्रा, सरकारी बंगला, इलाज, कैंटीन, पेंशन और भत्तों पर जनता में बढ़ता आक्रोश

पत्रकार सुशील कुमार स्वामी की विशेष रिपोर्ट

जौनपुर।देश की आम जनता जहां महंगाई, बेरोजगारी, महंगे इलाज, शिक्षा संकट और रोजमर्रा की परेशानियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ सांसदों और विधायकों को मिलने वाली आलीशान सुविधाएं अब लोगों के गले नहीं उतर रही हैं। गांव की चौपाल से लेकर शहर की चाय दुकानों तक एक ही सवाल गूंज रहा है— आखिर जनता के टैक्स के पैसों पर नेताओं को इतनी “राजसी सुविधाएं” क्यों दी जा रही हैं?
आज देश में करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी, रोजगार और इलाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। किसान कर्ज में दबा है, युवा नौकरी के लिए भटक रहा है, गरीब मरीज अस्पतालों में लाइन लगा रहा है, लेकिन दूसरी ओर सांसदों और विधायकों को लाखों रुपये वेतन और दर्जनों सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं।
           जानकारी के अनुसार सांसदों और विधायकों को मूल वेतन के अलावा निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, स्टाफ भत्ता, मुफ्त रेल यात्रा, हवाई यात्रा, सरकारी बंगला, बिजली-पानी, वाहन सुविधा, टेलीफोन, इंटरनेट, चिकित्सा सुविधा और आजीवन पेंशन तक मिलती है। कई पूर्व जनप्रतिनिधि चुनाव हारने के बाद भी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते रहते हैं।
          सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नेताओं के वेतन और भत्ते बढ़ाने की बात आती है तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक साथ खड़े दिखाई देते हैं। सदन में शायद ही कोई नेता इसका विरोध करता हो। राजनीतिक दल भले ही जनता के मुद्दों पर लड़ते नजर आएं, लेकिन सुविधाओं और वेतन बढ़ाने के मामले में लगभग सभी दल एकमत दिखाई देते हैं।
आम जनता का कहना है कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, कमाई और सुख-सुविधा का जरिया नहीं। लोगों का आरोप है कि नेताओं को मिलने वाली कई सुविधाएं देश की आर्थिक स्थिति और आम आदमी की हालत के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं।
        लोग सवाल उठा रहे हैं कि—
क्या जनता की गाढ़ी कमाई सिर्फ नेताओं की सुख-सुविधा के लिए है?
क्या जनप्रतिनिधियों को आजीवन पेंशन मिलनी चाहिए?
          क्या नेताओं को मुफ्त यात्रा और सरकारी बंगले की जरूरत कार्यकाल खत्म होने के बाद भी होनी चाहिए?
जब आम कर्मचारी पेंशन के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो नेताओं को विशेष लाभ क्यों?
          जौनपुर के सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सांसद और विधायक जनता की सेवा के लिए चुने जाते हैं, इसलिए उन्हें सीमित और पारदर्शी सुविधाएं ही मिलनी चाहिए। कार्यकाल समाप्त होने के बाद अधिकतर सरकारी सुविधाएं बंद हो जानी चाहिए।
         कई लोगों ने मांग उठाई है कि सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते तय करने के लिए स्वतंत्र आयोग बने और जनता के सामने पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए।
             राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को काम करने के लिए सुविधाएं देना जरूरी है, लेकिन यह व्यवस्था “जनसेवा” से ज्यादा “विशेषाधिकार” में बदलती दिख रही है। यही वजह है कि अब जनता के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है।

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